ये आसूं क्यो झड़ते है?
तपते देख धरती का दामन,
दो नयना रो पडते है ।।
नित्य सजाती जिस ऑचल को,
अपने मधुर अरमानों से ।
दग्ध देखती जब है बदली,
धरती को तिक्छण बाणो से ।।
सह नही पाती विरह बेदना,
गर्जन फूट पडते है ।
कहा मेघ ने अम्बर से,
ये आसूं क्यो झड़ते है ।।
डालो मे फल लग जाने पर,
तरूवर हर्षित होता है ।
देख चपलता हरित तरू की
माली गर्बित होता है ।।
भय होता है तूफानो का,
तरू कबतक उससे लडते है ।
कहा मेघ ने अम्बर से,
ये आसूं क्यो झड़ते है ।।
जीवन कि नदिया बहती है,
सुख-दुख के किनारो से ।
जरा भी दर्प न दिखता है,
उनके कोमल धारों से ।।
धारा को बिचलित होने पर,
सरवर रो पडते है ।
कहा मेघ ने अम्बर से,
ये आसूं क्यो झड़ते है।।
सागर तब प्रफुल्लित होते है,
जब व्यापार लगाए जाते है ।
तन उसका भी मुर्छित होता है,
जब रडार लगाए जाते है ।।
उदधि मे बिनास न छाए,
सोच नीर भी डरते है ।।
कहा मेघ ने अम्बर से,
ये आसूं क्यो झड़ते है।।
------- रमेश पाठक
