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ये आसूं क्यो झड़ते है

कहा मेघ ने अम्बर से, ये आसूं क्यो झड़ते है? तपते देख धरती का दामन, दो नयना रो पडते है ।। नित्य सजाती …

कोई टाइटल नहीं

जागो-जागो युगपुरूष, यह समय जागने का आया । खड़ग लिए बिकराल काल है, साक्षात खड़ी जिसकी साया ।। …

लाशें बोल रही हैं

रुक जाओ अब प्रकृति देवता, माता की चित्कार सुनो। शव कि अब अंबार लगी है, लघु दानव का हुंकार सुनो।। कांप रही …

वन्दना

जय जननी, जय शारदे, मुझे उलझन से उबार दे| जय जननी जय शारदे।। धवल वस्त्र, अरू हंस सिंहासन, विद्या विभूषित सुं…

लेखक कि ओर से.....

वन में स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाला मयूर नील गगन में छाए श्यामल बदलो को देख झूम उठते हैं जल में निवास करन…

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