रुक जाओ अब प्रकृति देवता,
माता की चित्कार सुनो।
शव कि अब अंबार लगी है,
लघु दानव का हुंकार सुनो।।
कांप रही है थरथर धरनी,
देखती कातर आंखों से ।
जंजीरों में कैद है मानव,
ताक रहा सलाखों से ।।
कौन सुने यह विरह वेदना,
सुनने वाला कोई नहीं ।
बची नहीं कोई ऐसी आंखें,
दृश्य देख जो रोई नहीं।।
दुर्गतियों को हरने वाली,
कहां दुर्गे तू सोई है ।
मानवता पर विनाश खड़ी है,
तू किस सपने में खोई है ।।
आकर मां फिर इस धरती पर,
एक बार नया हुंकार करो ।
तार- तार हो जाए विषाणु,
ऐसा कोई उपचार करो ।।
विकट काल में मैं आऊंगी,
तूने ही वचन दिया था ।
करूंगी मैं मानव की रक्षा,
ऐसा शपथ लिया था ।।
देखो आज धरती पर बैठी,
लाशें बोल रही है ।
जो जिंदा है उसके अंदर,
अंतः डोल रही है ।।
_____रमेश
