यह समय जागने का आया ।
खड़ग लिए बिकराल काल है,
साक्षात खड़ी जिसकी साया ।।
धर्मालय देवालय के पट,
बन्द हुए देखो आगे ।
संस्कृति तूम्हारी मौन हुई,
संस्कार जहाॅ डरकर भागे।।
अमृत बर्षाने वाले नभ,
अब शोले बर्षाऐगे ।
होती थी पत्थर की पूजा,
अब गोले पूजे जाऐगे ।।
ममता भी है नही सुरक्षित,
कैसा धरती का हाल हुआ ।
लूट रही है देव संस्कृति,
दानव का उचा भाल हुआ ।।
जागो चित कि अमरचेतना,
अब निद्रा को छोड़ो ना|
खण्ड-खण्ड होते समाज को
जंजीरो से जोड़ो ना ।।
आज नही जागे तो कल,
इस जग को पछताना होगा।
जहाॅ खड़ी थी पाषाण संस्कृति,
लौट वहीं जाना होगा ।।