कोई टाइटल नहीं

जागो-जागो युगपुरूष,

यह समय जागने का आया ।

खड़ग लिए बिकराल काल है,

साक्षात खड़ी जिसकी साया ।।

धर्मालय देवालय के पट,

बन्द हुए देखो आगे ।

संस्कृति तूम्हारी मौन हुई,

संस्कार जहाॅ डरकर भागे।।

अमृत बर्षाने वाले नभ,

अब शोले बर्षाऐगे ।

होती थी पत्थर की पूजा,

अब गोले पूजे जाऐगे ।।

ममता भी है नही सुरक्षित,

कैसा धरती का हाल हुआ ।

लूट रही है देव संस्कृति,

दानव का उचा भाल हुआ ।।

जागो चित कि अमरचेतना,

अब निद्रा को छोड़ो ना|

खण्ड-खण्ड होते समाज को

जंजीरो से जोड़ो ना ।।

आज नही जागे तो कल,

इस जग को पछताना होगा।

जहाॅ खड़ी थी पाषाण संस्कृति,

लौट वहीं जाना होगा ।।


_____रमेश

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने